ब्रह्मलीन सद्गुरुदेव पूज्यपाद स्वामी वेदांता नंद जी महाराज एवं ब्रह्मलीन श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी सहज प्रकाश की तपस्थली व शहर के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र गीता भवन में गीता भवन ट्रस्ट के सरपरस्त स्वामी चिन्मयानंद महाराज के पावन सानिध्य में आज महा शिवरात्रि पर्व के उपलक्ष्य में चल रही शिव पुराण कथा के अंतर्गत आज का दिवस अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातःकाल मंदिर प्रांगण में विधि-विधान से हवन यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर आहुतियां अर्पित की और भगवान शिव से सुख-शांति, समृद्धि एवं कल्याण की प्रार्थना की। इससे पहले नगर निगम के मेयर प्रवीण कुमार शर्मा, गीता भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष एडवोकेट सुनील गर्ग, वरिष्ठ उपाध्यक्ष रविंदर सूद, कनिष्ठ उपाध्यक्ष भरत कुमार अग्रवाल, महासचिव अंशुल श्रीकुंज, सह सचिव सुरिंदर गोयल तथा कोषाध्यक्ष योगेश गर्ग के अलावा भारी संख्या में शहर निवासियों ने पूजा अर्चना की रस्म अदा की। इस मौके पर हवन यज्ञ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य अश्विनी शर्मा ने बताया कि शिवरात्रि पर किया गया हवन आत्मशुद्धि, वातावरण की पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का माध्यम है। वेद मंत्रों के उच्चारण और ओम नमोंंः शिवाय” के जप के साथ जब घृत, समिधा और हवन सामग्री अग्नि में अर्पित की जाती है, तो वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का संकल्प होता है। शिवरात्रि पर हवन करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन के नकारात्मक तत्वों का नाश होता है। हवन उपरांत शिव पुराण कथा में द्वादश ज्योतिर्लिंगों की महिमा का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ गीता भवन ट्रस्ट सोसाइटी के अध्यक्ष सुनील गर्ग द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। अपने प्रेरक संबोधन में उन्होंने कहा कि शिवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्म जागरण का अवसर है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों की कथा हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर का प्रकाश अनंत है और श्रद्धा के माध्यम से जीवन के हर अंधकार को दूर किया जा सकता है। कथा व्यास ने बताया कि ज्योतिर्लिंग उस अनंत ज्योति-स्तंभ का प्रतीक हैं, जिनमें भगवान शिव स्वयं प्रकाश रूप में प्रकट हुए। गुजरात के प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर की कथा में चंद्रदेव को श्राप से मुक्ति का प्रसंग सुनाया गया। श्रीशैल पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन मंदिर को शिव-पार्वती के वात्सल्य से जोड़ा गया। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर को काल पर विजय का प्रतीक बताया गया, जबकि नर्मदा तट के ओंकारेश्वर मंदिर को ‘ॐ’ के दिव्य स्वरूप का प्रतीक बताया गया। हिमालय स्थित केदारनाथ मंदिर की कथा में पांडवों की तपस्या का उल्लेख हुआ। महाराष्ट्र के भीमाशंकर मंदिर में दुष्टों के संहार का प्रसंग सुनाया गया। काशी के काशी विश्वनाथ मंदिर को मोक्षदायिनी धाम बताया गया, वहीं नासिक स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर को गौतम ऋषि की तपस्या से जोड़ा गया। झारखंड के वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा में रावण की तपस्या और शिव के ‘वैद्य’ रूप का उल्लेख किया गया। द्वारका के समीप स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भक्तों की रक्षा का प्रतीक बताया गया। तमिलनाडु के रामनाथस्वामी मंदिर में श्रीराम द्वारा शिव पूजन का प्रसंग सुनाया गया और अंत में महाराष्ट्र के घृष्णेश्वर मंदिर को भक्तिन घृष्णा की अटूट श्रद्धा का प्रतीक बताया गया। संध्याकाल विशेष रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और महाआरती का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने रात्रि जागरण कर शिव नाम का संकीर्तन किया और प्रसाद ग्रहण किया। हवन यज्ञ, ज्योतिर्लिंग कथा और आरती के संगम ने आज के आयोजन को अत्यंत दिव्य और अविस्मरणीय बना दिया। गीता भवन ट्रस्ट सोसायटी के प्रयासों से यह शिव पुराण कथा नगर में आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक एकता का सशक्त संदेश दे रही है।

