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सुनाम की वीर प्रसूता मिट्टी ने आज अपने एक और शूरवीर को अश्रुपूर्ण विदाई दी। इतिहास के पन्नों में शहीद गुरप्रीत सिंह का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है, लेकिन गाँव ‘महिलां’ की उन गलियों में आज सन्नाटा है, जहाँ कभी इस जांबाज के कदमों की आहट सुनाई देती थी। सिख रेजिमेंट के 39 वर्षीय नायक गुरप्रीत सिंह, जो 21 वर्षों से सरहद की इबादत कर रहे थे, मणिपुर की दुर्गम पहाड़ियों में दुश्मनों से लोहा लेते हुए अमर हो गए।

– पवित्र देह पहुँचते ही फटा कलेजा, चीख-पुकार से कांपा आसमान—

जैसे ही शहीद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपट उनके पैतृक निवास पहुँचा पूरे इलाके में कोहराम मच गया। घर के आँगन में वीर जवान की देह को देखते ही परिजनों का धैर्य टूट गया। पत्नी, मासूम बच्चे, बूढ़ी माँ और भाई का रो-रोकर बुरा हाल था। हर आँख नम थी और हर ज़ुबान पर बस एक ही नाम था— ‘गुरप्रीत सिंह अमर रहें’।

– अभी तो गूँज रही थी हँसी, अब घर में पसरी है वीरानी—

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, जब श्री गुरु रविदास जी के प्रकाश पर्व पर गुरप्रीत छुट्टी लेकर घर आए थे। घर की दीवारों में अभी भी उनकी हँसी की गूँज बाकी थी। किसे पता था कि अपनों के साथ बिताए वे पल आखिरी होंगे। बूढ़ी माँ जल कौर की पथराई आँखें आज भी दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए हैं, मानो विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनका शेर बेटा अब कभी लौटकर “सत श्री अकाल” नहीं कहेगा।

– 21 साल का तप और शहादत का सर्वोच्च शिखर-

गुरप्रीत सिंह महज़ एक फौजी नहीं, बल्कि कर्तव्यपरायणता और सेवा की जीती-जागती मिसाल थे। उन्होंने अपनी आधी से ज्यादा उम्र देश की सेवा को समर्पित कर दी। गाँव वाले बताते हैं कि वे सिर्फ सरहद पर ही नहीं, बल्कि गाँव में भी समाज सेवा और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। मणिपुर की पहाड़ियों में जब देश-विरोधी तत्वों ने उन्हें चुनौती दी, तो यह जांबाज पीछे नहीं हटा और आखिरी सांस तक दुश्मन का मुकाबला करते हुए भारत माँ की गोद में सो गया।

– अधूरे रह गए पिता के वादे, मासूमों पर शहादत का भारी बोझ—

शहादत की इस खबर ने एक हँसते-खेलते परिवार की नींव हिला दी है। वह पिता, जो हर बार ‘जल्द वापस आने’ का वादा करके ड्यूटी पर जाता था, इस बार खामोशी की चादर ओढ़कर लौटा है।10 साल का बेटा और 7 साल की बेटी, इन मासूमों को शायद अभी शहादत का पूरा अर्थ भी नहीं पता, लेकिन उनकी आँखों की नमी बता रही है कि उन्होंने अपना सबसे बड़ा सहारा खो दिया है। पिता के साथ बिताई पिछली छुट्टियों की यादें अभी धुंधली भी नहीं हुई थीं कि अब उन्हें ताउम्र ‘शहीद के बच्चे’ होने का गौरवपूर्ण लेकिन अत्यंत भारी बोझ ढोना होगा।

 

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