पुरुषोत्तम मास में गीता भवन में श्रीमद्भागवत कथा का हुआ भक्तिभाव से समापन : एडवोकेट सुनील गर्ग

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ब्रह्मलीन स्वामी वेदान्तानंद जी महाराज की पावन तपोस्थली एवं ब्रह्मलीन स्वामी सहज प्रकाश जी महाराज की कर्मस्थली गीता भवन, मोगा में गीता भवन ट्रस्ट सोसायटी के तत्वावधान में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का समापन श्रद्धा, भक्ति एवं वैदिक परंपराओं के अनुरूप अत्यंत भव्य एवं आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ। कथा के अंतिम दिन प्रात:काल वैदिक मंत्रोच्चारण के मध्य हवन-यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें यजमानों एवं श्रद्धालुओं ने विधिपूर्वक यज्ञ अग्नि में आहुतियां अर्पित कर विश्व कल्याण, राष्ट्र की उन्नति तथा परिवारों के सुख-समृद्धि की कामना की। समापन समारोह का शुभारंभ ब्रह्मलीन स्वामी वेदान्तानंद जी महाराज की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके उपरांत श्रद्धालुओं द्वारा श्रीमद्भागवत महापुराण का विधिवत पूजन किया गया। भागवत पूजन के पश्चात कथा व्यास आचार्य पंडित सत्य नारायण जी महाराज सहित कथा में सेवा देने वाले सभी विद्वान ब्राह्मणों एवं आचार्यों का सम्मान एवं पूजन कर उन्हें अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न एवं सम्मान भेंट किए गए। सातवें एवं अंतिम दिन कथा व्यास आचार्य पंडित सत्य नारायण जी महाराज ने राजा परीक्षित के मोक्ष एवं श्री शुकदेव जी महाराज द्वारा प्रदत्त भागवत ज्ञान के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब राजा परीक्षित को अपने जीवन के केवल सात दिन शेष होने का ज्ञान हुआ, तब उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर गंगा तट पर बैठकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया। सात दिनों तक श्री शुकदेव जी महाराज द्वारा सुनाई गई भागवत कथा के प्रभाव से राजा परीक्षित को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने भगवान श्रीहरि के चरणों में अपना चित्त स्थिर कर मोक्ष प्राप्त किया। आचार्य जी ने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को अज्ञान से ज्ञान, अशांति से शांति और सांसारिक बंधनों से ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाने वाला दिव्य मार्गदर्शक है। राजा परीक्षित का प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य है और मनुष्य को अपने जीवन को धर्म, भक्ति और सत्कर्मों के लिए समर्पित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भागवत कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल कथा सुनना नहीं, बल्कि उसके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना है। जहां भगवान का नाम, संतों का सत्संग और भागवत का श्रवण होता है, वहां सकारात्मक ऊर्जा, सद्भावना और आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। इस अवसर पर गीता भवन ट्रस्ट सोसायटी के अध्यक्ष एडवोकेट सुनील गर्ग ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की सनातन संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक एवं जीवनोपयोगी संस्कृति है, जिसने सदियों से मानवता को सत्य, करुणा, सेवा, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाया है। श्रीमद्भागवत कथा जैसे आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों, पारिवारिक संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना के संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत हमें सिखाती है कि जीवन की वास्तविक सफलता धन और भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि चरित्र, सेवा, सदाचार और ईश्वर भक्ति में निहित है। यदि परिवारों में धार्मिक संस्कार और आध्यात्मिक वातावरण बना रहे, तो समाज स्वत: सुदृढ़ और समृद्ध बन सकता है। एडवोकेट सुनील गर्ग ने कहा कि गीता भवन ट्रस्ट सोसायटी, ब्रह्मलीन स्वामी वेदान्तानंद जी महाराज एवं ब्रह्मलीन स्वामी सहज प्रकाश जी महाराज की प्रेरणा से धर्म, सेवा, शिक्षा, संस्कार और समाज कल्याण के कार्यों के लिए निरंतर समर्पित है। ट्रस्ट का प्रयास है कि धार्मिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन मूल्यों से जोड़ा जाए तथा समाज में आध्यात्मिक जागरूकता का विस्तार किया जाए। समापन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने कथा व्यास एवं विद्वान ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा कथा के सफल आयोजन के लिए गीता भवन ट्रस्ट सोसायटी का आभार व्यक्त किया। पूरा गीता भवन परिसर हरिनाम संकीर्तन, भजन-कीर्तन और भगवान श्रीकृष्ण के जयघोषों से गुंजायमान रहा। अंत में सभी श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद वितरण किया गया तथा विश्व शांति, राष्ट्र की उन्नति एवं समस्त मानवता के कल्याण की मंगलकामना के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का भव्य एवं सफल समापन हुआ। यह आयोजन एक बार पुन: सिद्ध कर गया कि गीता भवन, मोगा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक जागरण, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता का एक जीवंत एवं प्रेरणादायी केंद्र है, जो समाज को धर्म और संस्कारों की अमूल्य धरोहर से निरंतर जोड़ रहा है।

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