पंजाब में ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ के दावों के बीच नशा तस्करों के हौसले बुलंद!

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। पंजाब में एक तरफ सरकार ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ मुहिम के जरिए नशे के कारोबार को जड़ से खत्म करने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ नशीली गोलियों और कैप्सूल की बरामदगी के मामले सामने आना इन दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। रायकोट में पुलिस ने एक स्विफ्ट कार सवार चार युवकों को नशीली गोलियों और कैप्सूल के 10 पत्तों सहित गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों में से एक के खिलाफ पहले भी तस्करी का मामला दर्ज है। यह कार्रवाई ऐसे समय में सामने आई है, जब पंजाब में मेडिकल नशे की उपलब्धता, उसकी सप्लाई और नशा विरोधी अभियान की प्रभावशीलता को लेकर बहस तेज है।

 

सवाल केवल चार युवकों की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क का है, जिसके जरिए नशीली दवाएं लोगों तक पहुंचती हैं। यदि मेडिकल नशे की बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए छापेमारी और सख्ती की जा रही है, तो फिर ऐसे पदार्थों की सप्लाई जारी रहने के पीछे कौन-सी कड़ियां सक्रिय हैं? क्या कार्रवाई केवल छोटे स्तर पर पकड़े गए आरोपियों तक सीमित रह जाती है, या उन लोगों तक भी पहुंचती है जो इस कारोबार को माल उपलब्ध करवाते हैं? इन सवालों के जवाब पुलिस की जांच और प्रशासन की जवाबदेही से ही सामने आ सकते हैं।

 

पुलिस को देखकर भागने लगे कार सवार, रास्ता बंद होने पर पकड़े गए:

 

थाना सिटी रायकोट के एएसआई सुखदेव सिंह के अनुसार, वह पुलिस पार्टी के साथ मेन जीटी रोड से बरनाला की तरफ से साहिबाजपुर रोड की ओर जा रहे थे। जब पुलिस टीम गैबी पुली के नजदीक पहुंची तो वहां एक स्विफ्ट कार खड़ी दिखाई दी। पुलिसकर्मी जब संदेह के आधार पर कार की जांच के लिए आगे बढ़े, तो चालक ने पुलिस को अपनी तरफ आते देखकर गाड़ी भगा दी।

 

पुलिस ने कार का पीछा किया, लेकिन आगे रास्ता बंद होने के कारण चालक गाड़ी को आगे नहीं ले जा सका। इसके बाद पुलिस टीम ने कार को घेर लिया और उसमें सवार चारों युवकों को काबू कर लिया। तलाशी के दौरान उनके कब्जे से नशीली गोलियां और कैप्सूल के 10 पत्ते बरामद होने की बात पुलिस ने कही है।

 

चारों आरोपी आपस में दोस्त, एक के खिलाफ पहले भी तस्करी का मामला:

 

पुलिस के मुताबिक, गिरफ्तार आरोपियों की पहचान सहजप्रीत सिंह उर्फ सहज निवासी गांव कलसियां, सुखप्रीत सिंह उर्फ सुख निवासी गली नंबर-6, मोहल्ला गुरु नानकपुरा रायकोट, संदीप सिंह उर्फ निकड़ा निवासी मोहल्ला मोहविया और अर्शप्रीत सिंह उर्फ अर्ष निवासी मुल्लापुर कोठे, रायकोट के रूप में हुई है।

 

जांच अधिकारी के अनुसार, चारों आरोपी आपस में दोस्त हैं और मिलकर नशा तस्करी का कारोबार करते हैं। पुलिस ने यह भी बताया कि संदीप सिंह उर्फ निकड़ा के खिलाफ पहले तस्करी का मामला दर्ज हो चुका है। पुलिस ने चारों आरोपियों को कार सहित गिरफ्तार कर थाना सिटी रायकोट में मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है।

 

हालांकि, इस मामले में नशीली दवाओं की आपूर्ति कहां से हुई, इन्हें किसे बेचा जाना था और इनके पीछे कोई बड़ा सप्लाई नेटवर्क सक्रिय है या नहीं, इन पहलुओं पर जांच के नतीजे सामने आना अभी बाकी है।

 

मेडिकल स्टोरों पर छापेमारी के दावों के बीच मेडिकल नशे की सप्लाई बड़ा सवाल:

 

पंजाब में मेडिकल नशे पर रोक लगाने के लिए मेडिकल स्टोरों की जांच, छापेमारी और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई किए जाने की चर्चा के बीच रायकोट की यह गिरफ्तारी एक अहम सवाल सामने लाती है कि क्या नशे के खिलाफ कार्रवाई केवल छापेमारी और गिरफ्तारियों तक सीमित है, या मेडिकल नशे की पूरी सप्लाई चेन को तोड़ने की दिशा में भी ठोस परिणाम मिल रहे हैं

 

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि नशीली दवाओं की हर बरामदगी अपने आप किसी मेडिकल स्टोर की संलिप्तता साबित नहीं करती। लेकिन बार-बार ऐसे मामले सामने आने पर दवाओं के स्रोत, उनकी खरीद-बिक्री, वितरण और अवैध इस्तेमाल की जांच बेहद जरूरी हो जाती है। पुलिस और संबंधित विभागों को यह स्पष्ट करना होगा कि जब्त की गई दवाएं कहां से आईं, क्या उनकी खरीद का कोई रिकॉर्ड है और क्या जांच में किसी सप्लायर या अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आई है।

 

सरकार की नशा विरोधी मुहिम की वास्तविक सफलता का आकलन केवल दर्ज मामलों और गिरफ्तार आरोपियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि नशीले पदार्थों की उपलब्धता कितनी कम हुई और अवैध कारोबार चलाने वाले नेटवर्क पर कितना प्रभावी प्रहार हुआ।

 

झोटा हत्याकांड के बाद और गहरे हुए सवाल:

 

मानसा में मेडिकल स्टोर मालिक अश्वनी कुमार द्वारा एंटी ड्रग टास्क फोर्स के लीडर परविंदर सिंह झोटा की कथित तौर पर गोलियां मारकर हत्या किए जाने की घटना के बाद पंजाब में नशे के कारोबार और उससे जुड़े विवादों को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं। इस घटना के बाद मेडिकल स्टोरों पर कथित छापेमारियों और उन्हें सील किए जाने की कार्रवाई को लेकर भी चर्चा हुई है।

 

झोटा के परिवार द्वारा मुख्यमंत्री और डीजीपी के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहने तथा शव का पोस्टमार्टम नहीं हो पाने को लेकर उठे सवालों के बीच रायकोट से आई गिरफ्तारी की खबर ने नशे के खिलाफ अभियान की प्रभावशीलता पर बहस को फिर तेज करने का आधार दिया है।

 

रायकोट की गिरफ्तारी एक बार फिर यही सवाल छोड़ती है: जब सरकार नशे के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ने का दावा कर रही है, तो नशीली गोलियां और कैप्सूल लोगों तक पहुंचने से रोकने में कहां कमी रह जा रही है,इस सवाल का जवाब दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, सप्लाई नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई और नशे की उपलब्धता में वास्तविक कमी से ही मिलेगा।

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